उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आज यानी रविवार को लखनऊ में पुलिस विभाग में चयनित 912 अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र वितरित किए। इस दौरान उत्तर प्रदेश सरकार के संसदीय कार्यमंत्री सुरेश खन्ना ने जापान से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा साझा किया।
एयरपोर्ट पर पहुंचकर शादी से किया इनकार
सुरेश खन्ना ने बताया कि जापान में एक भारतीय युवक और जापानी युवती के बीच दोस्ती हुई। दोनों साथ में काम करते थे और आगे चलकर दोनों ने शादी करने का फैसला किया। शादी की तारीख तय हो गई। शादी से पहले युवक को अपने माता-पिता को भारत से लाने के लिए एयरपोर्ट जाना था। युवक ने अपनी मंगेतर से अनुरोध किया कि वह भी उसे एयरपोर्ट पर छोड़ने आए। हालांकि, जापानी युवती ने साफ कहा कि उस समय उसका ऑफिस का समय है, इसलिए वह काम छोड़कर नहीं आ पाएगी। युवक के बार-बार जिद करने और बहुत जोर देने पर युवती आखिरकार एयरपोर्ट तो पहुंच गई, लेकिन उसने वहां पहुंचकर शादी करने से इनकार कर दिया। युवती ने कहा कि जो व्यक्ति शादी से पहले ही काम और ऑफिस जैसी अहम चीज को नजरअंदाज करने के लिए दबाव बना रहा है, वह शादी के बाद बार-बार काम छुड़वाने की कोशिश करेगा।
नव-नियुक्त पुलिसकर्मियों से समर्पित रहने को कहा
इस किस्से का जिक्र करते हुए मंत्री सुरेश खन्ना ने कहा कि जापान अपनी काम के प्रति इसी निष्ठा और सख्त अनुशासन से आज दुनिया में इतना आगे है। उन्होंने कहा कि अगर यही स्थिति भारत में होती, तो लोग आसानी से काम छोड़कर चले जाते और इसे गंभीरता से नहीं लेते। खन्ना ने नव-नियुक्त पुलिसकर्मियों से भी जापानियों की तरह अपने काम और कर्तव्य के प्रति 100% समर्पित रहने को कहा।
"पहले नौकरियों में भ्रष्टाचार, भैया-भतीजावाद था"
कार्यक्रम के दौरान सीएम योगी ने अपने संबोधन में कहा, "पहले माफिया खुलेआम जीप में असलहे लहराते चलते थे, "आज किसी की हिम्मत नहीं है; यूपी में कानून का राज है। अब यूपी में दंगे नहीं होते। हम दंगे की मॉक ड्रिल कराते हैं अब। पहले नौकरियों में भ्रष्टाचार था, भैया-भतीजावाद था।"
उन्होंने ने कहा, "जब किसी अभ्यर्थी का चयन शुचितापूर्ण और पारदर्शी तरीके से होता है, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति के परिवार के लिए नहीं, बल्कि शासन और कॉमनमैन के प्रति एक विश्वास का प्रतीक भी बनता है। 2017 से पहले मैंने उत्तर प्रदेश की व्यवस्था को बहुत नजदीक से देखा था और महसूस भी किया था। भर्ती प्रक्रिया की विसंगतियों को लेकर उस समय नौजवानों के सामने जो निराशा और हताशा थी, उसे हम लोगों ने महसूस किया था। उस समय कुछ करने की इच्छाशक्ति का अभाव था। भाई-भतीजावाद का बोलबाला था और पूरे सिस्टम को जकड़ा हुआ था। जब भर्ती प्रक्रिया में विसंगतियां हों, तो विश्वास कहां से होगा? विज्ञापन आते ही हर युवा के मन में एक भाव आता था कि भर्ती बिना सिफारिश और बिना लेन-देन के पूरी नहीं होगी।"
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